Bahula Shaktipeeth, Ketugram

Ketugram, West Bengal — सभी मंदिर West Bengal

🏛️ स्थापित Ancient, exact founding date… 🎫 General darshan is usually free. There may be local charges for special puja, bhog, prasad, or priest-assisted rituals, depending on the devotee’s request and temple practice. 🕐 Summer: approximately 6:00 AM; Winter: approximately 6:00 AM to 6:30 AM – Summer: approximately 10:00 PM; Winter: approximately 9:00 PM to 10:00 PM 🕉️ Shakti
लाइव दर्शन ⚫ Offline
🕉️

Temple Currently Offline

Usually live during morning & evening aarti

🔴 Browse Live Temples →

Bahula Shaktipeeth, Ketugram

Ketugram, West Bengal
🪔 आरती का समय

बहुला शक्तिपीठ में पूजा की परंपरा सरल और पारंपरिक है। प्रातः मंदिर खुलने के बाद माँ बहुला को फूल, धूप, दीप, जल, मिठाई और दिन की पहली प्रार्थना अर्पित की जाती है। दोपहर में स्थानीय व्यवस्था और दिन की सेवा के अनुसार भोग या विशेष अर्पण हो सकता है। संध्या के समय आरती का वातावरण विशेष रूप से शांत और भक्तिमय हो जाता है, जब दीपक माँ के सामने घुमाया जाता है और भक्त परिवार की रक्षा, समृद्धि और आंतरिक शक्ति की कामना करते हैं। नवरात्रि, दुर्गा पूजा, काली पूजा और महाशिवरात्रि पर विशेष पूजा और विस्तृत अनुष्ठान हो सकते हैं। सटीक आरती समय मंदिर के पुजारी या स्थानीय सेवकों से पहुंचकर अवश्य確認 करना चाहिए।

📋 Quick Facts
देवताShakti
TypeSaktipeeth
OpenSummer: approximately 6:00 AM; Winter: approximately 6:00 AM to 6:30 AM – Summer: approximately 10:00 PM; Winter: approximately 9:00 PM to 10:00 PM
EntryGeneral darshan is usually free. There may be local charges for special puja, bhog, prasad, or priest-assisted rituals, depending on the devotee’s request and temple practice.
Est.Ancient, exact founding date…
सर्वोत्तम समयनवंबर से फरवरी यात्रा के लिए सबसे आराम…

Checked March 26, 2026 6:57 pm

📜 के बारे में: Bahula Shaktipeeth, Ketugram

केतुग्राम में माँ बहुला का पवित्र शक्तिपीठ

पूर्व बर्धमान जिले के शांत ग्रामीण वातावरण में स्थित बहुला शक्तिपीठ माँ की कृपा का ऐसा स्थान है, जहां पहुंचते ही मन अपने आप धीमा हो जाता है। यह मंदिर अपने आकार या बाहरी भव्यता से नहीं, बल्कि अपनी सहज पवित्रता और गहरी आस्था से भक्त को छूता है। यहां विराजमान माँ बहुला को माँ सती, माँ पार्वती और आदि शक्ति के रूप में पूजा जाता है। शक्तिपीठों की परंपरा में हर स्थान केवल एक मंदिर नहीं होता, बल्कि वह भूमि होती है जहां माँ की दिव्य शक्ति ने पृथ्वी को स्पर्श किया। इसलिए भक्त जब बहुला शक्तिपीठ आते हैं, तो वे केवल दर्शन करने नहीं, बल्कि माँ की जीवंत उपस्थिति को अनुभव करने आते हैं।

लोकमान्यता के अनुसार केतुग्राम की इसी पावन भूमि पर माँ सती की बायीं भुजा, जिसे संस्कृत में बहु कहा जाता है, गिरी थी। भुजा का संबंध शक्ति, संरक्षण, सेवा, कर्म और माँ के आलिंगन से है। इसलिए बहुला शक्तिपीठ का भाव बहुत कोमल और गहरा है। यहां भक्त माँ से जीवन का भार संभालने की शक्ति मांगते हैं। कोई परिवार की रक्षा के लिए आता है, कोई संतान और स्वास्थ्य के लिए, कोई मन की शांति के लिए और कोई केवल माँ के चरणों में बैठकर अपनी पीड़ा हल्की करने के लिए। कुछ परंपराओं में गिरे हुए अंग को लेकर अलग मत भी मिलते हैं, पर केतुग्राम की जीवित आस्था माँ बहुला को सती की बायीं भुजा से जोड़कर ही पूजती है। बहुला नाम का अर्थ भी बहुत सुंदर है, वह जो भरपूर कृपा देने वाली, उदार और समृद्धि प्रदान करने वाली है।

माँ सती, भगवान शिव और शक्तिपीठों की पावन कथा

बहुला शक्तिपीठ की महिमा माँ सती और भगवान शिव की उस प्राचीन कथा से जुड़ी है, जो भक्ति, प्रेम, अपमान, विरह और दिव्य करुणा से भरी हुई है। माँ सती राजा दक्ष की पुत्री थीं, पर उनका हृदय भगवान शिव को समर्पित था। दक्ष को शिव का वैरागी स्वरूप स्वीकार नहीं था। जब दक्ष ने महान यज्ञ किया और भगवान शिव को उचित सम्मान नहीं दिया, तब माँ सती वहां पहुंचीं और अपने आराध्य पति का अपमान देखकर अत्यंत दुखी हुईं। उस पीड़ा को सहन न कर सकने के कारण उन्होंने योगाग्नि में अपना शरीर त्याग दिया। जब भगवान शिव ने यह सुना, तो उनका शोक समस्त सृष्टि पर छा गया। वे सती के शरीर को लेकर तांडव करने लगे और ब्रह्मांड का संतुलन डगमगाने लगा।

सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माँ सती के शरीर को अलग अलग भागों में विभाजित किया। जहां जहां वे अंग गिरे, वहां वहां शक्तिपीठ बने। इन पवित्र स्थलों में बहुला शक्तिपीठ भी एक है। यहां भक्त केवल एक पौराणिक घटना को याद नहीं करते, बल्कि उस भूमि पर खड़े होते हैं जहां माँ का दिव्य स्पर्श माना जाता है। शक्तिपीठों की परंपरा यह बताती है कि माँ एक स्थान, एक रूप या एक भाषा में सीमित नहीं हैं। वे पूरे भारत की भूमि पर अनेक नामों और अनेक भावों में विराजती हैं। बहुला में माँ का भाव शांत शक्ति का है। वे भक्त को भीतर से संभालती हैं, बिना शोर के रक्षा करती हैं और जीवन के कठिन मार्ग में साहस देती हैं।

माँ बहुला और भैरव भीरुक की संयुक्त उपासना

हर शक्तिपीठ में माँ के साथ भैरव की उपस्थिति विशेष महत्व रखती है, क्योंकि शक्ति और शिव कभी अलग नहीं होते। बहुला शक्तिपीठ में माँ को माँ बहुला के रूप में पूजा जाता है और भगवान शिव को भैरव भीरुक के रूप में स्मरण किया जाता है। कुछ परंपराओं में उन्हें सर्वसिद्धिदायक भाव से भी जोड़ा जाता है। माँ करुणा, पोषण, संरक्षण और वरदान देने वाली शक्ति हैं, जबकि भैरव उस पवित्र क्षेत्र के रक्षक हैं। भैरव भक्त के भय को दूर करते हैं और साधना को स्थिरता देते हैं। इसीलिए बहुला शक्तिपीठ में माँ और भैरव दोनों के दर्शन से तीर्थ यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

स्थानीय परंपरा में माँ बहुला के साथ उनके पुत्रों श्री गणेश और श्री कार्तिकेय की उपस्थिति का भी उल्लेख मिलता है। इससे मंदिर का वातावरण और भी मातृमय हो जाता है। भक्त मां के सामने केवल एक महाशक्ति का अनुभव नहीं करता, बल्कि ऐसी माँ का अनुभव करता है जो अपने बच्चों के साथ विराजमान हैं। श्री गणेश मंगल आरंभ और विघ्नों के नाश के प्रतीक हैं, जबकि श्री कार्तिकेय साहस, अनुशासन और विजय के प्रतीक हैं। इसलिए यह मंदिर परिवारों, विद्यार्थियों, कर्मशील लोगों और सुरक्षा की कामना रखने वाले भक्तों के लिए विशेष भाव रखता है।

माँ की स्तुति में यह श्लोक भावपूर्वक स्मरण किया जा सकता है: या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। इसका अर्थ है कि जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें बार बार प्रणाम है। बहुला शक्तिपीठ में यह श्लोक मन को सीधा छूता है, क्योंकि यहां भक्त अनुभव करता है कि माँ की शक्ति केवल मंदिर में नहीं, बल्कि जीवन जीने की हिम्मत में भी उपस्थित है।

मंदिर का इतिहास, स्थानीय स्मृति और राजा चंद्रकेतु

बहुला शक्तिपीठ की सटीक स्थापना तिथि किसी एक सर्वमान्य ऐतिहासिक अभिलेख में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे प्राचीन और जीवित परंपरा वाला तीर्थ मानना अधिक उचित है। स्थानीय मान्यता में मंदिर का संबंध राजा चंद्रकेतु से जोड़ा जाता है, जिनके द्वारा माँ बहुला की पाषाण प्रतिमा के साथ श्री गणेश और श्री कार्तिकेय की प्रतिमाएं स्थापित किए जाने की परंपरा कही जाती है। केतुग्राम का नाम और इतिहास भी स्थानीय कथाओं से भरा हुआ है। यहां की मिट्टी में शाक्त, शैव और वैष्णव भावों की अनेक परतें मिलती हैं।

पूर्व बर्धमान और व्यापक बंगाल क्षेत्र लंबे समय से माँ शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां काली पूजा, दुर्गा पूजा, ग्रामदेवी परंपरा, शिव पूजा और वैष्णव भक्ति एक साथ लोकजीवन में रची बसी हैं। केतुग्राम का बहुला शक्तिपीठ इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भूमि का हिस्सा है। यहां मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि लोगों की स्मृति, परिवारों की आशा और क्षेत्र की धार्मिक पहचान का केंद्र है। गांवों में मंदिर जीवन से अलग नहीं होता। वहीं उत्सव मनते हैं, वहीं व्रत पूरे होते हैं, वहीं संकट में माँ को पुकारा जाता है।

केतुग्राम और आसपास के क्षेत्र को बंगाली भक्ति परंपरा की स्मृतियों से भी जोड़ा जाता है। कुछ स्थानीय कथाएं मध्यकालीन कवि चंडीदास जैसी भक्ति-संस्कृति की ओर संकेत करती हैं। चाहे हर लोककथा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हो या न हो, भक्तिभाव का सत्य स्पष्ट है। इस क्षेत्र के लोग माँ बहुला को केवल पुराणों की देवी नहीं मानते, बल्कि अपने घर, अपने गांव और अपने जीवन की रक्षक माँ मानते हैं। यही मंदिर की सबसे बड़ी जीवंतता है।

वास्तुकला और मंदिर का शांत वातावरण

बहुला शक्तिपीठ की वास्तुकला सरल और शांत है। मंदिर के हल्के गुलाबी रंग, खुले मंडप, साधारण स्तंभ और शांत आंगन इसे ग्रामीण बंगाल के पवित्र मंदिरों जैसा आत्मीय रूप देते हैं। यह मंदिर आंखों को चकित करने के लिए नहीं, मन को स्थिर करने के लिए बना लगता है। जब भक्त मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करता है, तो घंटियों की ध्वनि, धूप की सुगंध, फूलों की आभा और माँ के गर्भगृह का दृश्य मिलकर भीतर एक शांत भाव जगाते हैं। बड़े तीर्थों की दौड़भाग से अलग यहां भक्त कुछ क्षण ठहर सकता है, सांस ले सकता है और माँ से अपने मन की बात कह सकता है।

मंदिर परिसर में माँ बहुला का मुख्य स्थान और भैरव तथा अन्य देवी देवताओं से जुड़े पवित्र स्थल भक्तों को पूर्ण तीर्थ अनुभव देते हैं। माँ की प्रतिमा को वस्त्र, फूल, आभूषण, सिंदूर और भक्ति से सजाया जाता है। श्री गणेश और श्री कार्तिकेय की उपस्थिति से मंदिर में परिवार जैसा भाव आता है। शक्तिपीठों में माँ को कभी उग्र शक्ति, कभी करुणा, कभी रक्षा और कभी ज्ञान के रूप में अनुभव किया जाता है। बहुला में माँ का भाव विशेष रूप से करुणामयी और संरक्षण देने वाला प्रतीत होता है।

कुछ विवरणों में मंदिर को अजय नदी के तट से जोड़ा गया है, जबकि वर्तमान मानचित्रों में मंदिर केतुग्राम गांव के भीतर स्थित दिखाई देता है और नदी से कुछ दूरी पर है। भक्तों के लिए यह भौगोलिक विवरण श्रद्धा को कम नहीं करता। मंदिर की पहचान उसकी शक्तिपीठ परंपरा, माँ बहुला की आराधना और पीढ़ियों से चल रही पूजा में है। यही वह भाव है जो इस स्थान को पवित्र बनाता है।

त्योहार, पूजा और मंदिर का भक्तिमय जीवन

बहुला शक्तिपीठ में नवरात्रि, दुर्गा पूजा, काली पूजा और महाशिवरात्रि के समय विशेष भक्ति का वातावरण बनता है। बंगाल में माँ की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हृदय का उत्सव है। दुर्गा पूजा के समय छोटे मंदिर भी दीप, फूल, मंत्र, धुनुची, ढाक और भक्तों की भावनाओं से जीवंत हो जाते हैं। बहुला शक्तिपीठ में भक्त माँ से परिवार की रक्षा, सुख, समृद्धि, संतान, स्वास्थ्य और कठिनाइयों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। केतुग्राम, कटवा, बर्धमान और आसपास के गांवों से भक्त विशेष दिनों में मां के दर्शन के लिए आते हैं।

नवरात्रि में माँ के नौ रूपों की साधना की जाती है, इसलिए शक्तिपीठों में इस समय विशेष महत्व रहता है। भक्त फूल, फल, मिठाई, नारियल, लाल वस्त्र, सिंदूर और श्रद्धा के अनुसार अर्पण करते हैं। महाशिवरात्रि भी यहां महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्येक शक्तिपीठ भैरव से जुड़ा होता है। बहुला में भैरव भीरुक को भगवान शिव के रक्षक स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। जो भक्त शाक्त परंपरा को गहराई से समझते हैं, वे जानते हैं कि माँ और भैरव दोनों की पूजा से शक्तिपीठ यात्रा पूर्ण होती है।

दैनिक पूजा में प्रातः और संध्या की आरती, फूल अर्पण, मिठाई और फल का भोग, दीप प्रज्वलन और सरल दर्शन शामिल होते हैं। यहां की पूजा बहुत अधिक बाहरी प्रदर्शन वाली नहीं, बल्कि आत्मीय और पारंपरिक है। कई बार स्थानीय पुजारी या सेवा करने वाले लोग भक्तों को पूजा पद्धति समझा देते हैं। बहुला शक्तिपीठ की सुंदरता इसी में है कि यहां भक्त जल्दी में नहीं, श्रद्धा में आता है। घंटी और मंत्रों के बीच की शांति में भी माँ की उपस्थिति अनुभव होती है।

दर्शन का अनुभव और भक्त माँ बहुला के पास क्यों आते हैं

बहुला शक्तिपीठ का दर्शन बड़े शहरों के मंदिरों से अलग अनुभव देता है। भक्त जब कटवा, बर्धमान या आसपास के मार्गों से होते हुए केतुग्राम पहुंचता है, तो यात्रा में ही तीर्थ का भाव आने लगता है। गांव की सड़कें, स्थानीय लोग, मंदिर का शांत परिसर और माँ का नाम मन को धीरे धीरे संसार की बेचैनी से अलग कर देते हैं। मंदिर के सामने पहुंचकर भक्त को लगता है कि वह किसी परिचित माँ के घर आया है। यहां भव्यता कम है, अपनापन अधिक है।

माँ बहुला के पास भक्त अनेक कामनाओं के साथ आते हैं। कोई परिवार की सुरक्षा चाहता है, कोई जीवन में समृद्धि, कोई बीमारी से राहत, कोई मन की शांति, कोई साहस और कोई अपने कर्म मार्ग में स्थिरता। बायीं भुजा की मान्यता इस मंदिर को विशेष अर्थ देती है। भुजा सेवा करती है, रक्षा करती है, काम करती है और अपनों को संभालती है। इसी प्रकार माँ बहुला भक्त को जीवन की जिम्मेदारियां निभाने की शक्ति देती हैं। कई भक्त पश्चिम बंगाल के शक्तिपीठ दर्शन के दौरान बहुला को कालीघाट, तारापीठ, कंकालीतला, अट्टहास और जोगाद्या जैसे अन्य पवित्र स्थलों के साथ जोड़कर यात्रा करते हैं।

माँ की उपासना में यह मंत्र श्रद्धा से बोला जा सकता है: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। यह मंत्र माँ की रक्षक और परिवर्तनकारी शक्ति को जागृत करने वाला माना जाता है। इसका भाव है कि माँ नकारात्मकता को दूर करें, आत्मबल जगाएं और भक्त को धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति दें। बहुला शक्तिपीठ में यह मंत्र किसी औपचारिक जप से अधिक माँ से की गई सीधी विनती जैसा लगता है।

हृदय से भक्तिपूर्ण समापन

बहुला शक्तिपीठ केवल 51 शक्तिपीठों की सूची में एक नाम नहीं है। यह उन भक्तों के लिए पवित्र स्थान है जो माँ को सरल, शांत और आत्मीय रूप में अनुभव करना चाहते हैं। यहां मंदिर की शक्ति उसकी चमक में नहीं, बल्कि भक्तों की आस्था में है। कोई चुपचाप आता है, फूल चढ़ाता है, माँ के सामने सिर झुकाता है और लौटते समय मन में थोड़ी अधिक हिम्मत लेकर जाता है। केतुग्राम की शांत हवा में माँ बहुला यही सिखाती हैं कि सच्ची शक्ति को शोर की आवश्यकता नहीं होती। वह भीतर चुपचाप खड़ी रहती है और जीवन को संभालती है।

LiveDarshanHub.com पर बहुला शक्तिपीठ का पृष्ठ केवल पता और दर्शन समय बताने वाला पृष्ठ नहीं होना चाहिए। यह भक्तों को माँ के उस भाव से जोड़ने वाला माध्यम होना चाहिए, जहां शक्ति करुणा बनकर मिलती है और करुणा संरक्षण बनकर साथ चलती है। माँ बहुला और भैरव भीरुक सभी भक्तों को साहस, समृद्धि, परिवार की रक्षा, मन की शांति और माँ शक्ति की अखंड भक्ति प्रदान करें। जय माँ बहुला।

May Maa Bahula and Bhairav Bhiruk bless every devotee with strength, protection, prosperity, peace, and deep devotion. Jai Maa Bahula.

Darshan & Aarti Timings

🚪 Darshan Timings

General darshan is usually available from about 6:00 AM to 10:00 PM,

🪔 Aarti Schedule

Bahula Shaktipeeth follows a simple and traditional worship rhythm. The morning worship usually begins after the temple opens, when Maa Bahula is offered flowers, incense, lamp, water, sweets, and the first prayers of the day. The afternoon period may include bhog or local offering arrangements depending on the priest and the day’s seva. In the evening, the temple atmosphere becomes especially peaceful during sandhya aarti, when lamps are waved before Maa and devotees offer prayers for protection, family welfare, and strength. On Navratri, Durga Puja, Kali Puja, and Maha Shivaratri, special puja and longer ritual arrangements may be performed. Exact aarti timing can vary locally, so devotees should confirm with the temple priest or caretaker on arrival.

⭐ Best Time to Visit

November to February is the most comfortable season due to pleasant weather.

⚠️ Timings may change on festivals, special occasions, or during temple renovation. Please verify with the temple before visiting.

Visitor Information

Entry Fee
General darshan is usually free. There may be local charges for special puja, bhog, prasad, or priest-assisted rituals, depending on the devotee’s request and temple practice.
Dress Code
Men should wear modest traditional or simple respectful clothing such as dhoti, kurta, pajama, shirt, or full-length trousers. Women should wear saree, salwar suit, kurti, or other modest Indian attire. Sleeveless, revealing, very short, torn, or inappropriate clothing should be avoided. Footwear should be removed before entering the sacred area. Devotees should avoid carrying leather items, large bags, and unnecessary valuables near the sanctum.

🗺️ Location & How to Reach

📍
Full Address
Shri Bahula Shaktipeeth, Ambalgram Road, Ketugram, Purba Bardhaman, West Bengal 713140, India
✈️
Nearest Airport

Airport: Kazi Nazrul Islam Airport, Durgapur, about 110 to 125 km by road; Netaji Subhas Chandra Bose International Airport, Kolkata, about 150 to 170 km by road

🚂
Nearest Railway Station

Katwa Junction Railway Station, about 8 to 12 km; Ambalgram Railway Station, about 8 km; Bardhaman Railway Station, about 65 to 70 km

🚌
Nearest Bus Stand

Ketugram local bus stop, about 200 meters to 1 km depending on drop point; Katwa Bus Stand, about 10 to 12 km

🧭 Detailed Directions

By Air
The nearest useful airport for Bahula Shaktipeeth is Kazi Nazrul Islam Airport at Andal near Durgapur, located about 110 to 125 km by road depending on the route. Devotees may also use Netaji Subhas Chandra Bose International Airport in Kolkata, which is better connected for national and international travel and is about 150 to 170 km from Ketugram by road. From either airport, devotees should continue by hired car, taxi, or a combination of train and local transport. Travel time from Kolkata may range from 4 to 5.5 hours depending on traffic, road condition, and local congestion near Katwa and Ketugram.

By Train
Katwa Junction is the most practical railway station for most devotees visiting Bahula Shaktipeeth. From Katwa, local buses, autos, e-rickshaws, cycle rickshaws, and hired cars are available toward Ketugram. The distance is commonly described as around 8 to 12 km depending on the exact route and drop point. Ambalgram Railway Station is also nearby, around 8 km from the temple, but train connectivity may be more limited. Bardhaman Railway Station is a larger railhead, about 65 to 70 km away, and can be used by devotees coming from Kolkata, Howrah, Durgapur, or other parts of West Bengal.

By Road
Bahula Shaktipeeth is located in Ketugram near Katwa in Purba Bardhaman district. From Katwa, devotees can reach the temple in about 25 to 40 minutes by local road transport. From Bardhaman, the road journey may take around 2 to 2.5 hours depending on route and traffic. From Kolkata, the road distance is roughly 150 to 170 km, and devotees should plan a full-day trip if returning the same day. Roads near the village may be narrower than city roads, so it is better to travel in daylight, especially for first-time visitors.

By Local Transport
Local buses, autos, cycle rickshaws, e-rickshaws, and small hired vehicles connect Katwa and nearby areas with Ketugram. On festival days such as Navratri, Durga Puja, Kali Puja, and Maha Shivaratri, local movement can become busier, and temporary arrangements may vary. Devotees should keep some extra time for the final approach, carry water, and confirm the return transport before staying late in the evening, as rural transport frequency may reduce after dark.