Bimala Temple (Shakti Peeth), Puri

Puri, Odisa — सभी मंदिर Odisa

🏛️ स्थापित Ancient sacred site 🎫 General entry into Maa Bimala Temple is through the Shree Jagannath Temple complex. Entry to the Jagannath Temple complex is traditionally restricted to Hindus, and visitors must follow the temple’s religious and security rules. General darshan is free. 🕐 Summer: approximately 5:00 AM, subject to Shree Jagannath Temple nitis; Winter: approximately 5:00 AM to 5:30 AM, subject to daily rituals – Summer: approximately 10:00 PM to 11:00 PM, subject to Shree Jagannath Temple nitis; Winter: approximately 10:00 PM to 11:00 PM, subject to daily rituals 🕉️ Shakti
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Bimala Temple (Shakti Peeth), Puri

Puri, Odisa
🪔 आरती का समय

माँ बिमला की पूजा श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर की दैनिक नीतियों से जुड़ी हुई है। सुबह मंदिर खुलने के बाद माँ को फूल, धूप, दीप और मंत्रों के साथ पारंपरिक पूजा अर्पित की जाती है। माँ बिमला की सबसे महत्वपूर्ण दैनिक परंपरा महाप्रसाद से जुड़ी है, क्योंकि श्री जगन्नाथ को अर्पित भोग माँ बिमला को अर्पित होने के बाद ही पूर्ण महाप्रसाद माना जाता है। संध्या समय माँ के सामने दीप और प्रार्थना के साथ शांत शाक्त भाव में पूजा होती है। दुर्गा पूजा के सोलह दिवसीय विशेष उत्सव में माँ बिमला को विशेष आराधना अर्पित की जाती है। सटीक आरती और पूजा समय श्री जगन्नाथ मंदिर की दैनिक नीतियों के अनुसार बदल सकता है, इसलिए भक्तों को मंदिर पहुंचकर स्थानीय रूप से पुष्टि करनी चाहिए।

📋 Quick Facts
देवताShakti
TypeSaktipeeth
OpenSummer: approximately 5:00 AM, subject to Shree Jagannath Temple nitis; Winter: approximately 5:00 AM to 5:30 AM, subject to daily rituals – Summer: approximately 10:00 PM to 11:00 PM, subject to Shree Jagannath Temple nitis; Winter: approximately 10:00 PM to 11:00 PM, subject to daily rituals
EntryGeneral entry into Maa Bimala Temple is through the Shree Jagannath Temple complex. Entry to the Jagannath Temple complex is traditionally restricted to Hindus, and visitors must follow the temple’s religious and security rules. General darshan is free.
Est.Ancient sacred site
सर्वोत्तम समयअक्टूबर से मार्च यात्रा के लिए सबसे आर…

Checked March 26, 2026 6:57 pm

📜 के बारे में: Bimala Temple (Shakti Peeth), Puri

जगन्नाथ धाम के भीतर स्थित पवित्र शक्तिपीठ

पुरी की पावन धरती पर, जहां हर ओर श्री जगन्नाथ का नाम श्रद्धा से गूंजता है, उसी महान मंदिर परिसर के भीतर एक छोटा पर अत्यंत शक्तिशाली मंदिर स्थित है। यह है माँ बिमला मंदिर, जिसे माँ विमला मंदिर भी कहा जाता है। बहुत से भक्त पुरी को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और माँ सुभद्रा के कारण जानते हैं, लेकिन जो भक्त इस धाम के गहरे आध्यात्मिक रहस्य को समझते हैं, वे जानते हैं कि माँ बिमला इस धाम की आंतरिक शक्ति हैं। वे मंदिर परिसर की रक्षक देवी हैं और महाप्रसाद परंपरा की पूर्णता भी उन्हीं की कृपा से मानी जाती है।

माँ बिमला का मंदिर श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर के दक्षिण-पश्चिम भाग में, पवित्र रोहिणी कुंड के पास स्थित है। आकार में यह मंदिर मुख्य जगन्नाथ मंदिर की तुलना में छोटा है, पर इसकी आध्यात्मिक महिमा बहुत बड़ी है। यह शक्तिपीठ माना जाता है, अर्थात वह पवित्र स्थान जहां माँ सती के शरीर का अंग पृथ्वी पर गिरा था। पुरी की परंपरा में इस स्थान को माँ सती के चरणों से जोड़ा जाता है। चरणों का भाव बहुत गहरा है। भक्त चरणों में सिर झुकाता है, अहंकार छोड़ता है, शरण लेता है और कृपा प्राप्त करता है। इसलिए माँ बिमला के सामने दर्शन करना केवल मंदिर दर्शन नहीं, बल्कि माँ के चरणों में आत्मसमर्पण का अनुभव है।

माँ सती की कथा और बिमला शक्तिपीठ का आध्यात्मिक अर्थ

माँ बिमला मंदिर की महिमा माँ सती और भगवान शिव की उस करुणामयी कथा से जुड़ी है, जिसने शक्तिपीठों की परंपरा को जन्म दिया। माँ सती राजा दक्ष की पुत्री थीं, लेकिन उनका हृदय भगवान शिव को समर्पित था। दक्ष को भगवान शिव का वैरागी रूप स्वीकार नहीं था। जब दक्ष ने एक महान यज्ञ किया और भगवान शिव को उचित सम्मान नहीं दिया, तब माँ सती वहां पहुंचीं और अपने आराध्य पति का अपमान देखकर भीतर से टूट गईं। उस पीड़ा को सहन न कर सकने के कारण उन्होंने योगाग्नि में अपना शरीर त्याग दिया। जब भगवान शिव को यह पता चला, तो उनका शोक ब्रह्मांड को कंपा देने वाला हो गया। वे सती के शरीर को लेकर तांडव करने लगे और सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा।

सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया और माँ सती का शरीर अनेक पवित्र भागों में विभाजित हुआ। जहां जहां वे अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने। पुरी को उस परंपरा में वह स्थान माना जाता है जहां माँ सती के चरण गिरे। कुछ परंपराओं में अलग स्थानीय मत मिल सकते हैं, लेकिन पुरी की शाक्त परंपरा माँ बिमला को इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी मानती है। चरणों का प्रतीक हमें विनम्रता, सेवा, यात्रा, शरण और संरक्षण की याद दिलाता है। भक्त जब माँ बिमला के सामने आता है, तो वह अपने भीतर की अशुद्धि, चिंता और अहंकार को माँ के चरणों में रख देता है।

देवी उपासना में यह मंत्र अत्यंत श्रद्धा से बोला जाता है: या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। इसका अर्थ है कि जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें बार बार प्रणाम है। माँ बिमला के मंदिर में यह मंत्र हृदय को इसलिए छूता है क्योंकि यहां माँ की शक्ति शांत, प्राचीन और जीवित परंपरा के रूप में अनुभव होती है।

माँ बिमला, श्री जगन्नाथ और महाप्रसाद का रहस्य

माँ बिमला और श्री जगन्नाथ का संबंध पुरी धाम की सबसे अद्भुत आध्यात्मिक विशेषताओं में से एक है। शक्तिपीठ परंपरा में हर शक्ति के साथ भैरव की उपस्थिति मानी जाती है। माँ बिमला के इस शक्तिपीठ में श्री जगन्नाथ स्वयं भैरव रूप में पूजित माने जाते हैं, जिन्हें जगन्नाथेश्वर भाव से भी स्मरण किया जाता है। यह बहुत दुर्लभ और गहरा संगम है, जहां वैष्णव, शाक्त, शैव और तांत्रिक परंपराएं एक ही पवित्र धाम में मिलती हैं। पुरी यह सिखाता है कि ईश्वर का सत्य संकीर्ण नहीं, बल्कि विशाल और समावेशी है।

माँ बिमला को श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर की रक्षक देवी माना जाता है। उनकी महिमा का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण महाप्रसाद परंपरा में दिखाई देता है। श्री जगन्नाथ को अर्पित भोजन तब तक पूर्ण महाप्रसाद नहीं माना जाता जब तक वह माँ बिमला को अर्पित न हो जाए। इसका अर्थ है कि भगवान के भोग को जगत के लिए प्रसाद रूप में स्वीकार कराने में माँ की कृपा आवश्यक है। जो भक्त पुरी में महाप्रसाद ग्रहण करता है, वह केवल जगन्नाथ जी की कृपा नहीं, बल्कि माँ बिमला की स्वीकृति और आशीर्वाद भी प्राप्त करता है। यह परंपरा माँ बिमला को मंदिर के दैनिक जीवन का अनिवार्य भाग बनाती है।

ओडिशा की भक्ति परंपरा में एक सुंदर कथा मिलती है कि कलियुग में माँ बिमला पुरी में बैठकर विष्णु के भोजन का अवशेष स्वीकार करेंगी। यह कथा किसी सामान्य अवशेष की नहीं, बल्कि अत्यंत पवित्र अंतरंगता की कथा है। भगवान को अर्पित भोजन माँ की स्वीकृति से महाप्रसाद बनकर भक्तों तक पहुंचता है। इसलिए पुरी में जब कोई भक्त महाप्रसाद हाथ में लेता है, तो उस प्रसाद में माँ बिमला की अदृश्य कृपा भी शामिल होती है।

इतिहास, वास्तुकला और प्राचीन कलिंग शैली

माँ बिमला मंदिर को श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर के प्राचीनतम मंदिरों में से एक माना जाता है। इसके मुख्य विग्रह को प्राचीन काल से जोड़ा जाता है और मंदिर की वर्तमान संरचना को सामान्य रूप से 9वीं शताब्दी CE की कलिंग वास्तुकला से संबंधित माना जाता है। यह मंदिर बलुआ पत्थर और लेटराइट से बना है और पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है। इसकी रचना पारंपरिक ओडिशा मंदिर शैली में है, जिसमें विमान, जगमोहन, नाट मंडप और भोग मंडप जैसे भाग मिलते हैं। आकार में छोटा होने के बाद भी यह मंदिर ओडिशा की प्राचीन देवालय परंपरा की गंभीरता और गरिमा को धारण किए हुए है।

मंदिर का विमान रेखा देउल शैली का है। दीवारों और द्वारों में शाक्त, शैव और ओडिया मंदिर कला के संकेत दिखाई देते हैं। मंदिर रोहिणी कुंड के पास स्थित है, जिसे जगन्नाथ मंदिर परिसर के प्राचीन पवित्र स्थलों में गिना जाता है। इस स्थान की निकटता माँ बिमला मंदिर की प्राचीनता को और गहरा भाव देती है। मंदिर के संरक्षण और नवीनीकरण से भी इसकी ऐतिहासिक महत्ता स्पष्ट होती है।

माँ बिमला का विग्रह अत्यंत विशिष्ट है। उन्हें केवल उग्र युद्ध रूप में नहीं, बल्कि शांत, कल्याणकारी और महिमामयी देवी के रूप में अनुभव किया जाता है। पारंपरिक वर्णनों में माँ के हाथों में जपमाला और अमृत से भरा कलश बताया जाता है। यह रूप भक्त को बताता है कि शक्ति केवल विनाश की नहीं, बल्कि दीर्घ आयु, भक्ति, पवित्रता और कल्याण की भी अधिष्ठात्री है। मंदिर के प्रवेश के पास सिंह और हाथी का प्रतीक शुभ और अशुभ, धर्म और अधर्म, तथा शक्ति और अहंकार के बीच के आध्यात्मिक संदेश को व्यक्त करता है। भक्त के लिए यह सब केवल शिल्प नहीं, बल्कि माँ की शिक्षा है।

दुर्गा पूजा, गुप्त परंपराएं और पुरी की शाक्त आत्मा

माँ बिमला से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण पर्व दुर्गा पूजा है। यहां दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है और परंपरा में इसे सोलह दिनों तक मनाया जाता है। सामान्य नवरात्रि की नौ दिवसीय परंपरा से अलग, माँ बिमला की पूजा पुरी में गहरे शाक्त भाव के साथ होती है। इस समय मंदिर का वातावरण अत्यंत शक्तिमय हो जाता है। विशेष मंत्र, पूजा, अर्पण और परंपरागत विधियां माँ की आराधना में की जाती हैं। शाक्त भक्तों के लिए यह समय इसलिए विशेष है क्योंकि माँ बिमला को इस दौरान केवल करुणामयी माता नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में पूजा जाता है।

श्री जगन्नाथ की परंपरा अपनी व्यापकता और समावेशी भाव के लिए प्रसिद्ध है। एक ही मंदिर परिसर में जगन्नाथ जी की वैष्णव भक्ति, माँ बिमला की शाक्त उपासना, भैरव भाव से शैव संकेत और प्राचीन तांत्रिक परंपराओं की स्मृतियां मिलती हैं। माँ बिमला की कुछ विशेष पूजा परंपराएं मंदिर नियमों के अनुसार निजी रूप से संपन्न होती हैं। भक्त को हर आंतरिक विधि देखने की आवश्यकता नहीं होती। उस अवधि का वातावरण ही माँ की उपस्थिति को गहराई से अनुभव करा देता है।

नवरात्रि, विजयादशमी, अश्विन मास और जगन्नाथ मंदिर के प्रमुख पर्व जैसे रथ यात्रा, स्नान पूर्णिमा, चंदन यात्रा और कार्तिक मास भी भक्तों के लिए महत्वपूर्ण हैं। माँ बिमला का अपना शाक्त स्वरूप है, लेकिन उनका मंदिर जगन्नाथ धाम की दैनिक और वार्षिक पूजा लय से जुड़ा हुआ है। यही पुरी की सबसे बड़ी विशेषता है। यहां भगवान और माँ अलग अलग नहीं लगते, बल्कि एक दूसरे को पूर्ण करते हैं।

जगन्नाथ मंदिर परिसर में माँ बिमला का दर्शन अनुभव

माँ बिमला का दर्शन सामान्यतः श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर की बड़ी तीर्थ यात्रा का हिस्सा बनता है। भक्त पहले मंदिर के पवित्र द्वारों से प्रवेश करता है, सुरक्षा व्यवस्था से गुजरता है और जूते, मोबाइल फोन, कैमरा तथा अन्य प्रतिबंधित वस्तुएं बाहर छोड़ता है। मंदिर के भीतर का वातावरण साधारण स्थान जैसा नहीं होता। घंटियों की ध्वनि, सेवायतों की गति, महाप्रसाद की सुगंध, प्राचीन मंदिरों की उपस्थिति और जगन्नाथ महाप्रभु का विशाल भाव मन को अपने आप श्रद्धा से भर देता है। इसी पवित्र प्रवाह के बीच भक्त माँ बिमला के मंदिर की ओर जाता है।

माँ बिमला के सामने खड़े होते ही भाव अधिक शांत और गंभीर हो जाता है। यह मंदिर मुख्य गर्भगृह जितना विशाल नहीं दिखता, फिर भी इसकी आध्यात्मिक गुरुत्व शक्ति बहुत गहरी है। भक्त माँ को मंदिर परिसर की मौन रक्षक के रूप में प्रणाम करते हैं। कोई परिवार की रक्षा मांगता है, कोई स्वास्थ्य, कोई समृद्धि, कोई साहस, कोई मन की पवित्रता। कई भक्त महाप्रसाद ग्रहण करने से पहले या बाद में माँ को प्रणाम करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि माँ की कृपा के बिना पुरी यात्रा पूर्ण नहीं होती।

माँ बिमला के सामने हृदय में यह सरल मंत्र बोला जा सकता है: ॐ ह्रीं बिमलायै नमः। इसका भाव है कि मैं पवित्र और उज्ज्वल माँ बिमला को प्रणाम करता हूं। बिमला नाम ही पवित्रता का संकेत देता है। माँ के सामने भक्त केवल सांसारिक सफलता नहीं मांगता, बल्कि निर्मल मन, कोमल हृदय और धर्ममय जीवन की कामना करता है।

हृदय से भक्तिपूर्ण समापन

माँ बिमला मंदिर उन पवित्र स्थानों में से है जिनकी महिमा बाहरी आकार से नहीं, भीतर के अनुभव से समझ आती है। जगन्नाथ पुरी के विशाल आध्यात्मिक संसार के भीतर माँ बिमला प्राचीन गरिमा के साथ विराजती हैं। वे हर भक्त को याद दिलाती हैं कि हर भोग, हर प्रसाद, हर आशीर्वाद और हर तीर्थ यात्रा के पीछे माँ शक्ति की मौन उपस्थिति होती है। वे वह माँ हैं जो प्रभु के भोग को महाप्रसाद बनाकर संसार को कृपा देती हैं। वे वह शक्तिपीठ हैं जहां भक्त माँ सती के पावन चरणों को प्रणाम करता है। वे पुरी धाम की आंतरिक रक्षक शक्ति हैं।

LiveDarshanHub.com पर माँ बिमला मंदिर का पृष्ठ भक्तों को यह समझाने वाला होना चाहिए कि जगन्नाथ धाम एक जीवंत शक्तिपीठ भी है। माँ बिमला का दर्शन पुरी यात्रा को गहराई देता है और भक्त के हृदय में माँ की शांत शक्ति के प्रति आदर भरता है। माँ बिमला और श्री जगन्नाथ सभी भक्तों को पवित्रता, सुरक्षा, महाप्रसाद की कृपा और अटूट भक्ति प्रदान करें। जय माँ बिमला।

May Maa Bimala and Shri Jagannath bless every devotee with purity, protection, Mahaprasad grace, and unwavering devotion. Jai Maa Bimala.

Darshan & Aarti Timings

🚪 Darshan Timings

early morning around 5:00 AM until late evening or night around 10:00 PM to 11:00 PM

🪔 Aarti Schedule

Maa Bimala’s worship is woven into the ritual life of the Shree Jagannath Temple complex. Morning worship begins after the temple opens and includes traditional offerings of flowers, incense, lamps, and mantras to Maa. The most important daily connection is the offering of Jagannath Mahaprasad to Maa Bimala, because the bhog of Shri Jagannath becomes fully sanctified as Mahaprasad only after it is offered to her. Evening worship is performed with lamps and prayers in a peaceful Shakta mood. During Durga Puja, especially the sixteen-day observance, Maa Bimala receives special worship according to temple tradition. Exact aarti and ritual timings can change according to the daily nitis of Shree Jagannath Temple, so devotees should confirm locally before planning a specific puja visit.

⭐ Best Time to Visit

October to March is the most comfortable season.

⚠️ Timings may change on festivals, special occasions, or during temple renovation. Please verify with the temple before visiting.

Visitor Information

Entry Fee
General entry into Maa Bimala Temple is through the Shree Jagannath Temple complex. Entry to the Jagannath Temple complex is traditionally restricted to Hindus, and visitors must follow the temple’s religious and security rules. General darshan is free.
Dress Code
Men should wear modest Indian or respectful clothing such as dhoti, kurta, pajama, shirt, or full-length trousers. Women should wear saree, salwar suit, kurti, or other modest Indian attire. Shorts, sleeveless tops, revealing clothes, torn clothing, and inappropriate casual wear should be avoided.

🗺️ Location & How to Reach

📍
Full Address
Maa Bimala Temple, inside Shree Jagannath Temple Complex, Grand Road, Puri, Odisha 752001, India
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Nearest Airport

Airport: Biju Patnaik International Airport, Bhubaneswar, about 60 km

🚂
Nearest Railway Station

Puri Railway Station, about 3 km

🚌
Nearest Bus Stand

Puri Bus Stand, about 3 km; Malatipatpur Bus Terminal, about 7 km

🧭 Detailed Directions

By Air
The nearest airport for Bimala Temple is Biju Patnaik International Airport in Bhubaneswar, located about 60 km from Puri. From the airport, devotees can reach Puri by taxi, app cab, private car, or airport-linked road transport. The journey generally takes around 1.5 to 2 hours depending on traffic. During Rath Yatra, Snana Purnima, New Year, Kartik month, and major holiday periods, travel time can increase because of heavy pilgrim movement toward Jagannath Dham.

By Train
Puri Railway Station is the most convenient railhead, located about 3 km from the Shree Jagannath Temple complex. It is well connected with Bhubaneswar, Kolkata, Delhi, Chennai, Ahmedabad, Mumbai, and many other cities through regular trains. From the railway station, devotees can take an auto rickshaw, cycle rickshaw, taxi, e-rickshaw, or local transport toward the temple area. The final approach near the temple is usually managed through pedestrian routes and local traffic regulations.

By Road
Puri is well connected by road with Bhubaneswar, Cuttack, Konark, and other parts of Odisha. From Bhubaneswar, the road distance is about 60 km and the journey usually takes around 1.5 to 2 hours. From Konark, Puri is about 35 km away and the coastal road journey is spiritually and visually beautiful. Devotees traveling by private vehicle should note that parking near the Jagannath Temple is regulated, and walking or using local transport may be required for the final stretch.

By Local Transport
Inside Puri, auto rickshaws, cycle rickshaws, e-rickshaws, taxis, and local buses are available for reaching the Jagannath Temple area. Since Bimala Temple is located inside the Shree Jagannath Temple complex, devotees must follow the same entry route and temple rules as Jagannath Temple visitors. During Rath Yatra, Kartik month, weekends, and major festivals, police and temple administration may introduce special barricades, queue systems, and pedestrian routes. Devotees should travel light and keep extra time for security checks.